वाराणसी। काशी हिंदू विश्वविद्यालय (बीएचयू) स्थित वैदिक विज्ञान केंद्र के तत्वावधान में आयोजित त्रिविधसीय अंतरराष्ट्रीय संगोष्ठी “वैदिक विज्ञान के विविध स्वरूप” के दूसरे दिन विद्वानों ने वेदों को आधुनिक विज्ञान, प्रबंधन और पर्यावरण संरक्षण का अक्षय स्रोत बताया। मंगलवार को आयोजित तीन महत्वपूर्ण तकनीकी सत्रों में देश-विदेश के विशेषज्ञों ने इस बात पर जोर दिया कि वैश्विक संकटों का समाधान केवल वैदिक ऋचाओं और यज्ञ विज्ञान के शोध में ही निहित है।
प्रथम सत्र: ‘यज्ञ विज्ञान’ और ब्रह्मांडीय ऊर्जा
संगोष्ठी के प्रथम तकनीकी सत्र में ‘यज्ञ विज्ञान’ पर चर्चा हुई। मुख्य अतिथि जेएनयू के प्रो. रामनाथ झा ने कहा, “वेद और विज्ञान में कोई भेद नहीं है। जहाँ पश्चिमी परंपरा तार्किक विश्लेषण पर टिकी है, वहीं भारतीय परंपरा प्रत्यक्ष अनुभव को प्रमाण मानती है।” उन्होंने क्वांटम फिजिक्स का उदाहरण देते हुए कहा कि जिस जुड़ाव की बात आज आधुनिक भौतिकी कर रही है, उसे भगवान श्रीकृष्ण ने सदियों पहले गीता में स्पष्ट कर दिया था। उपनिषदों के ज्ञान से ही जर्मनी में ‘इकोलॉजी’ जैसे विषयों का जन्म हुआ।
विशिष्टातिथि प्रो. उपेंद्र कुमार त्रिपाठी ने ओजोन परत की रक्षा में यज्ञ की भूमिका को रेखांकित किया, जबकि प्रो. महेंद्र पांडेय ने स्पष्ट किया कि विश्व में जारी युद्धों के बीच शांति का मार्ग केवल यज्ञीय चेतना से ही संभव है।
द्वितीय सत्र: वैदिक प्रबंधन और विधि (लॉ)
द्वितीय सत्र ‘विधि एवं प्रबंधन विज्ञान’ पर केंद्रित रहा। आईएमएस बीएचयू के निदेशक प्रो. आशीष वाजपेयी ने बताया कि आधुनिक मैनेजमेंट के ‘अनुशासन’ और ‘प्रक्रिया’ के सिद्धांत मीमांसा शास्त्र के ‘विधि-निषेध’ वाक्यों में पहले से मौजूद हैं। उन्होंने ‘संघे शक्ति युगे युगे’ का मंत्र देते हुए बताया कि मीमांसा शास्त्र हमें योग्यता के अनुसार कार्य सौंपने (Delegation of Authority) का विज्ञान सिखाता है।
विधि संकाय के डॉ. विवेक कुमार पाठक ने कहा कि ‘धर्म’ ही राजाओं का राजा है। यदि समाज सत्य और अहिंसा का पालन करे, तो दंड संहिता की आवश्यकता ही नहीं पड़ेगी। वहीं, प्रो. सुजाता अभिजात ने दिल्ली जैसे महानगरों के बढ़ते AQI स्तर पर चिंता जताते हुए वेदों में वर्णित पृथ्वी माता और मनुष्य के संबंधों को पुनर्स्थापित करने की आवश्यकता बताई।
तृतीय सत्र: पर्यावरण एवं जीवन दर्शन
अंतिम सत्र में प्रो. बलराम पाढ़ी ने ‘माता भूमिः पुत्रोऽहं पृथिव्याः’ के सूत्र के साथ प्रकृति के प्रति सम्मान की अपील की। प्रो. आलोक चतुर्वेदी (USA) और प्रो. गोपबंधु मिश्र ने कहा कि वेदों में वृक्षारोपण को पुण्य और जल प्रदूषण को पाप की श्रेणी में रखा गया है। सत्र की अध्यक्षता करते हुए प्रो. सदाशिव कुमार द्विवेदी ने ऋग्वेद से लेकर अथर्ववेद तक में वर्णित पंचमहाभूतों के संरक्षण को मानव अस्तित्व के लिए अनिवार्य बताया।
प्रमुख बिंदु:
- यज्ञ का महत्व: वायु शोधन और ओजोन परत की सुरक्षा का वैज्ञानिक आधार।
- प्रबंधन कौशल: मीमांसा शास्त्र से निकल रहे हैं आधुनिक मैनेजमेंट के सूत्र।
- वैश्विक उपस्थिति: यूके, यूएसए और देश के विभिन्न संस्थानों से आए विशेषज्ञों ने रखे विचार।
समारोह की झलक:
कार्यक्रम का शुभारंभ महामना मालवीय जी की प्रतिमा पर माल्यार्पण और दीप प्रज्वलन से हुआ। केंद्र के समन्वयक प्रो. विनय कुमार पांडेय ने अतिथियों का स्वागत अंगवस्त्र व मोमेंटो देकर किया। सत्रों का संचालन डॉ. पवन पांडेय एवं डॉ. एस. श्रीराम ने किया।
