वाराणसी। काशी हिंदू विश्वविद्यालय (बीएचयू) के कृषि विज्ञान संस्थान (IAgSc) में ‘किसान मेला-2026’ का भव्य शुभारंभ हुआ। इस मेले का मुख्य उद्देश्य वैज्ञानिकों, नीति-निर्माताओं और किसानों को एक मंच पर लाकर आधुनिक खेती को बढ़ावा देना और शोध संस्थानों व किसान समुदाय के बीच की दूरी को कम करना है।
नवाचार और साझेदारी पर जोर
कार्यक्रम का उद्घाटन मुख्य अतिथि उत्तर प्रदेश के कृषि एवं कृषि शिक्षा मंत्री सूर्य प्रताप शाही, बीएचयू के कुलपति प्रो. अजित कुमार चतुर्वेदी और आईआईटी (बीएचयू) के निदेशक प्रो. अमित पात्रा ने दीप प्रज्वलित कर किया। इसके पश्चात अतिथियों ने प्रदर्शनी स्टॉलों का अवलोकन किया और वहां प्रदर्शित नई तकनीकों व उत्पादों के बारे में किसानों व वैज्ञानिकों से चर्चा की।
कुलपति प्रो. अजित कुमार चतुर्वेदी ने अपने संबोधन में कहा, “किसानों के पास खेतों का अमूल्य व्यावहारिक अनुभव होता है। वैज्ञानिक अनुसंधान को सफल बनाने के लिए किसानों को नवाचार में केवल लाभार्थी नहीं, बल्कि सक्रिय साझेदार बनाना जरूरी है।”
जमीनी स्तर पर तकनीक पहुँचाने का लक्ष्य
कृषि मंत्री श्री सूर्य प्रताप शाही ने कहा कि कृषि क्षेत्र को सशक्त बनाने के लिए वैज्ञानिक प्रगति को प्रयोगशाला से निकालकर जमीन तक पहुँचाना होगा। इससे न केवल उत्पादकता बढ़ेगी, बल्कि किसानों की आय में भी स्थिरता आएगी। उन्होंने इस दिशा में बीएचयू के प्रयासों की सराहना की।
वहीं, आईआईटी (बीएचयू) के निदेशक प्रो. अमित पात्रा ने कृषि में आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस और आधुनिक तकनीक की भूमिका पर प्रकाश डाला। उन्होंने कहा कि अंतःविषय सहयोग ही भविष्य की कृषि चुनौतियों का समाधान करेगा।
प्रमुख आकर्षण और गतिविधियाँ
- प्रगतिशील किसानों का अनुभव: पद्मश्री श्री चंद्र शेखर सिंह ने किसानों को पारंपरिक ज्ञान के संरक्षण के साथ-साथ आधुनिक पद्धतियों को अपनाने के लिए प्रेरित किया।
- तकनीकी सत्र: उद्घाटन के बाद आयोजित सत्र में विशेषज्ञों ने प्राकृतिक खेती, मोटे अनाज (मिलेट्स) के उत्पादन, एकीकृत कृषि प्रणाली और सरकारी योजनाओं पर विस्तार से जानकारी दी।
- सम्मान समारोह: कार्यक्रम के अंत में कृषि क्षेत्र में उत्कृष्ट कार्य करने वाले प्रगतिशील किसानों को पुरस्कृत व सम्मानित किया गया।
साझा संकल्प
संस्थान के निदेशक प्रो. उदय प्रताप सिंह ने कहा कि ऐसे मेले ज्ञान के आदान-प्रदान का सबसे सशक्त माध्यम हैं। कार्यक्रम का समापन संयोजक प्रो. पी. के. सिंह के धन्यवाद ज्ञापन के साथ हुआ। सभी विशेषज्ञों ने एक सुर में स्वीकार किया कि “विज्ञान और परंपरा के समन्वय से ही विकसित कृषि–समर्थ भारत” का सपना साकार होगा।
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