प्रयागराज। इलाहाबाद हाईकोर्ट ने ज्योतिषपीठ के शंकराचार्य स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद सरस्वती को बड़ी राहत देते हुए उनकी गिरफ्तारी पर रोक लगा दी है। यौन शोषण जैसे गंभीर आरोपों में घिरे शंकराचार्य की याचिका पर सुनवाई करते हुए कोर्ट ने सरकार से बच्चों की स्थिति और मामले की निष्पक्षता पर कई सवाल पूछे।
सरकार की दलील: ‘सीधे हाईकोर्ट आना नियमों के खिलाफ’
सुनवाई के दौरान अपर महाधिवक्ता मनीष गोयल ने याचिका की पोषणीयता (Maintainability) पर सवाल उठाए। उन्होंने तर्क दिया कि अग्रिम जमानत के लिए सीधे हाईकोर्ट नहीं आया जा सकता और इसके लिए सुप्रीम कोर्ट के फैसलों का हवाला दिया। हालांकि, कोर्ट ने इस आपत्ति को दरकिनार करते हुए कहा कि असाधारण परिस्थितियों में सीधे हाईकोर्ट आने पर कोई अनिवार्य कानूनी रोक नहीं है।
साजिश का आरोप: ‘मुकदमा दर्ज कराने वाला खुद इनामी अपराधी’
शंकराचार्य के वकील ने कोर्ट में दलील दी कि यह पूरा मामला एक सोची-समझी साजिश है। उन्होंने चौंकाने वाला दावा किया कि:
शिकायतकर्ता खुद एक हिस्ट्रीशीटर है, जिस पर गोहत्या, दुष्कर्म और हत्या जैसे गंभीर मामले दर्ज हैं और वह 25 हजार का इनामी है।
पहले 18 जनवरी (मौनी अमावस्या) को मारपीट की अर्जी दी गई थी, जब उस पर केस नहीं हुआ तो ‘पॉक्सो’ की अर्जी डाल दी गई। कथित पीड़ित बच्चों का मेडिकल परीक्षण घटना के करीब एक महीने बाद कराया गया, जो विवेचना पर सवाल खड़ा करता है। बच्चों की मार्कशीट हरदोई की है, जबकि विवाद प्रयागराज के माघ मेले से शुरू हुआ था।
कोर्ट ने पूछा- ‘बच्चे कहां हैं?’
अदालत ने मामले की गंभीरता को देखते हुए सरकार से सीधा सवाल किया कि कथित पीड़ित बच्चे इस वक्त कहां हैं? सरकार की ओर से बताया गया कि बाल कल्याण समिति ने बच्चों को उनके माता-पिता को सौंप दिया है। वहीं, बचाव पक्ष का कहना था कि बच्चों के माता-पिता का कोई अता-पता नहीं है और यह पूरा मामला प्रशासन के साथ हुए पुराने विवाद का बदला लेने के लिए ‘प्रायोजित’ है।
विवाद की जड़: माघ मेले का वो घटनाक्रम
यह पूरा विवाद इसी साल माघ मेले के दौरान शुरू हुआ था। मौनी अमावस्या के दिन पालकी से स्नान करने जा रहे शंकराचार्य और उनके शिष्यों को प्रशासन ने भीड़ का हवाला देकर रोक दिया था। शंकराचार्य ने आरोप लगाया था कि पुलिस ने बटुकों की चोटी पकड़कर घसीटा और उनके साथ अभद्रता की। इसके विरोध में शंकराचार्य 11 दिनों तक त्रिवेणी मार्ग पर धरने पर बैठे रहे। प्रशासन की ओर से माफी न मांगने पर 28 जनवरी को वह माघ मेला छोड़कर काशी चले गए थे।
