काशी यानि बनारस एक अति प्राचीन जिंदा शहर जो ब्रह्ववर्त्त से लेकर वाराणसी तक लगभग बत्तीसों नामो से अपनी पहचान को जिंदा किये हुए है।एक समय 1332ई से लेकर 1347 ई तक यह मुहमदाबाद के नाम से भी जाना गया। यह शहर आज भी अपनी रवायतों को लेकर संजीदा है क्योंकि इसका मूल जो है वह विविधता में एकता को समेटे हुए है या यू माने तो।
बहुलतावाद(Pluarlism) यानि ‘हम’ की भावना इसका जन्मना गुण है। तभी तो दुनिया के छब्बीसो विशाल धर्मों के लाखों अनुयायी यहाँ साथ -साथ विचरते है। इसका जो चरित्र है वह “आत्मावलोचन” का है क्योंकि जिस गंगा की गोद मे काशी बसा है ,वह इस पूरे शहर में उत्तरवाहिनी हो जाती है मतलब वह स्वयं को पलट-पलट कर देखती है, स्वयं का मूल्यांकन करती है तभी तो यहां के लोग किसी के बंधन को बर्दाश्त नही करते। उदाहरण कभी इन लोगो ने घोर वामपंथी नेता सत्यनारायण सिह को भी अपनी नुमाइंदगी का मौका दिया और आज घोर दक्षिणपंथी नेता नरेंद्र मोदी के साथ भी मजबूती से खड़े है क्योकि यहां की मिट्टी विकास के उत्तरोत्तर प्रयास में भरोसा करती है।
यहाँ की फिजा में इतनी बेपरवाही है कि लोग ‘केअर लेस ‘ नही ‘केअर फ्री ‘ होकर कहते है कि ‘बाबा हवे न उहे देखिह ‘। दुनिया के पहले दार्शनिक कपिल की जन्मभूमि रही तो दूसरी तरफ जैनियो के तीन तीर्थंकरों की भी मातृभूमि रही तो साथ ही बुद्ध के धर्मचक्रप्रवर्तन की भी साक्षी बनी।
यही नही शंकर और मंडन मिश्र के शास्त्रार्थ की भूमि भी रही तो कबीर और रैदास का अवतरण भी इसी भूमि पर हुआ। तुलसी ने यही विचर कर अपनी चौपाईयोँ औऱ दोहों से भारत में मर्यादा रचने का काम किया ।
इसकी पवित्रता की प्रगाढ़ता इस वाकयात से समझा जा सकता है कि एक बार पंडित राज जगन्नाथ ने अपनी मृत यौवन बाला पत्नी के शव को पंचगंगा घाट पर रखकर ‘गंगा लहरी स्रोत’ का पाठ करते हुए अंतिम श्लोक ‘गंगाम ममंगाम अमलि करोतु’ पढ़कर पूरा किया तो स्वयं माँ गंगा स्वतः सभी सीढ़ियों पर चढ़ते हुए शव को स्वयं में प्रवाहित कर ले गयी।
काशी परमानन्द का शहर है और इसका चप्पा-चप्पा एक मुक्त विश्वविद्यालय बनकर यह बताता है यह “स्टेट ऑफ डिज़ायर” यानि” इच्छाओं का शहर “है जो ‘चाह’को ‘मुक्ति की तलाश’ तक पहुचाता है और विकल्पों से ऊपर उठाकर निर्विकल्पता का बोध कराते हुए बोधत्व की तरफ ले जाता है, जहां मनुष्य अपनी चैतन्यता की ऊँचाई पर पहुचकर मान और अपमान से परे शिवत्व को प्राप्त कर लेती है।
काशी का एक जुमला है कि आप शेर हो या हिरन। काशी में आने पर सब साँड़ हो जाते है जो न सम्मान की खोज करता है और न अपमान से डरता है।
नोट- 1- काशी में गंगा जो उत्तर वाहिनी होकर 360° घूमी है तो अंतिम डिग्री पर बसा शहर गाजीपुर भी है इसीलिए यह काशी का एक अखंड भाग है।
2- पुरानी काशी में जो गलियां पश्चिम से पूरब जाती है वह माँ गंगा के किनारे निकलती है और जो उत्तर से दक्षिण जाती है वह आगे बंद हो जाती है।
3- बनारस में जितने भी ” टोला” है वह पहले गुरुओं के शिक्षा आश्रम थे क्योकि संस्कृत में “टोल” का अर्थ “गुरु- गृह “होता है।
साभार-काशी के अदभुत विद्वान अमिताभ भट्टाचार्य जी का जिनको सुनकर थोड़ा बहुत काशी के बारे में जान और लिख पाया। साथ ही आभार डॉ Lenin Raghuvanshi भैया का जिसकी पुस्तक ” Kashi” के कवर विमोचन के अवसर पर बनारस यानि एक मस्तमौला शहर बनारस को बुझने -,समझने की प्रवृति को बल मिला। डॉ शम्मी कुमार सिह
