प्राचीन डीएनए तकनीकों के जरिए भारतीय उपमहाद्वीप और पश्चिम एशिया के बीच आनुवंशिक संबंधों की जांच की; आईओई योजना के तहत पूरा किया शोध दौरा।
वाराणसी। काशी हिंदू विश्वविद्यालय (बीएचयू) के जंतु विज्ञान विभाग के शोध छात्र शैलेश देसाई ने अंतरराष्ट्रीय स्तर पर संस्थान का मान बढ़ाया है। ज्ञान लैब में कार्यरत शैलेश ने हाल ही में यूनाइटेड किंगडम के प्रतिष्ठित ऑक्सफोर्ड विश्वविद्यालय में पांच महीने का सफल शोध दौरा पूरा किया। अक्टूबर 2025 से फरवरी 2026 तक चले इस दौरे में उन्होंने प्राचीन डीएनए (aDNA) विश्लेषण की अत्याधुनिक तकनीकों के माध्यम से पशुओं के पालतू बनने (एनिमल डोमेस्टिकेशन) के इतिहास पर गहरा अध्ययन किया।
विश्व प्रसिद्ध विशेषज्ञ के साथ किया कार्य
शैलेश ने यह शोध दौरा बीएचयू की इंस्टीट्यूशन ऑफ एमिनेंस (IoE) योजना के वित्तीय सहयोग से पूरा किया। ऑक्सफोर्ड में उन्होंने पुरातत्व विद्यालय के प्रोफेसर ग्रेगर लार्सन की देखरेख में कार्य किया। प्रोफेसर लार्सन को एनिमल डोमेस्टिकेशन के क्षेत्र में प्राचीन डीएनए पद्धतियों का जनक माना जाता है। उनके द्वारा विकसित तरीके आज दुनिया भर में पशुओं के विकासवादी इतिहास को समझने के लिए मानक माने जाते हैं।
भैंसों के जेनेटिक इतिहास पर केंद्रित रहा शोध
इस शोध यात्रा के दौरान शैलेश देसाई ने मुख्य रूप से भैंसों के जेनेटिक इतिहास पर ध्यान केंद्रित किया। उनके शोध के मुख्य बिंदु निम्नलिखित रहे:
- उत्पत्ति और प्रसार: भारतीय उपमहाद्वीप में भैंसों की उत्पत्ति और उनके पालतू बनाए जाने की प्रक्रिया को समझना।
- समुद्री संपर्क: ऐतिहासिक साक्ष्य भारत और पश्चिम एशिया (ईरान, इराक, इटली और मिस्र) के बीच पुराने समुद्री संबंधों की ओर इशारा करते हैं। शैलेश ने यह जांचा कि भैंसें इन क्षेत्रों तक कब और किन आनुवंशिक विशेषताओं के साथ पहुंचीं।
- प्रजाति विश्लेषण: उन्होंने नदी और दलदली क्षेत्रों में रहने वाली भैंसों के जेनेटिक अंतरों की भी जांच की, जिसमें पूर्वी एशिया की आबादी भी शामिल है।
प्राचीन नमूनों से निकाला डीएनए
प्राचीन डीएनए अनुसंधान एक जटिल प्रक्रिया है जिसमें हड्डियों, बालों और त्वचा जैसे हजारों साल पुराने पुरातात्विक नमूनों से आनुवंशिक सामग्री निकाली जाती है। इसके लिए विशेष प्रयोगशालाओं की आवश्यकता होती है। शैलेश ने प्रोफेसर लार्सन की लैब में नया डेटा तैयार किया है, जो भविष्य में भारत में ‘एनिमल पैलियोजेनोमिक्स’ की नींव को मजबूत करने में मील का पत्थर साबित होगा।
पूर्व के शोध और उपलब्धियां
शैलेश देसाई इससे पहले भी महत्वपूर्ण शोधों का हिस्सा रहे हैं:
- आर्य आक्रमण मॉडल को चुनौती: गुजराती लोगों के आनुवंशिक विश्लेषण के जरिए उन्होंने आर्य आक्रमण की परिकल्पना को चुनौती देने वाले शोध में योगदान दिया है।
- सूअर डोमेस्टिकेशन: उन्होंने भारत में सूअरों के पालतू बनने के इतिहास पर भी काम किया है।
- मानव विकास: दक्षिण एशिया में मानव बस्तियों के बसने और नवपाषाण काल के दौरान मानव विकास के इतिहास में भी उनकी गहरी रुचि है।
