वाराणसी : आदिवासियों को जल, जंगल व जमीन से बेदखल करने के खिलाफ बीएचयू के छात्रों ने विरोध मार्च

वाराणसी : सुप्रीम कोर्ट एक आदेश जारी हुआ कि 21 राज्यों के 20 लाख से अधिक आदिवासी परिवारों को जंगलों से बेदखल किया जाये। इस फैसले के पीछे सरकार की मंशा भी साफ दिखती है जब सरकारी पक्ष का वकील कोर्ट में नही जाता हैं। इस आदेश के खिलाफ काशी हिंदू विश्वविद्यालय के छात्र-छात्राओं ने शुक्रवार बीएचयू के विश्वनाथ मन्दिर से लंका गेट तक विरोध मार्च निकाला व लंका गेट पर सभा किया।

नुक्कड़ नाटक कर सरकार द्वारा आदिवासियों के जमीन हड़पने का नाटक दिखाया

इससें पहले छात्रों ने विश्वनाथ मन्दिर पर एक नुक्कड़ नाटक किया। जिससे सरकार द्वारा विकास के नाम पर आदिवासियों के जमीन छीनना दिखाया गया। वही उच्च न्यायालय के आदेश-अनुसार यह कार्य मामले की अगली तारीख यानी 27 जुलाई से पहले किया जाना है।जंगलों से आदिवासियों की बेदखली का आदेश साफ-तौर पर इस बात की ओर इशारा कर रहा है कि जल, जंगल और जमीन को आदिवासियों से छीनकर सरकार कार्पोरेट लूट के लिए रास्ता साफ कर रही है।

छात्रों की सरकार से मांग जो आदिवासियों को अधिकार दिया जाए उसे पालन किया जाए

छात्रों ने सरकार से ये भी मांग रखी कि संविधान में पांचवीं और छठवीं अनुसूची में आदिवासियों को जो अधिकार दिए गए हैं, उसका पालन किया जाए। बीएचयू छात्रों में प्रेमचंद ओराँव ने सभा मे अपनी बात रखते है कहा की जमीन आदिवासियों का है और यह सरकार आदिवासियों को उनके जीवन को छीनना चाहती है क्योंकि उनका जीवन जंगल से ही जूड़ा है। आगे स्वीकृति ने आपना अनुभव रखते हुए बताया कि किसी तरह कंपनियाँ जंगल, पहाड़ो को काटकर शोषण कर रही है और कंपनियों से निकलने वाली गैसों और कचड़े को गाँव में ही दबा रही है। जिससे वहाँ के लोगों और जानवरों के जीवन पर खतरा मंडरा रहा है।

वही एक और छात्रा आकांक्षा ने कहा कि अभी हमला सरकारें करती थी कभी सलवा जुडूम तो कभी ऑपरेशन ग्रीन, तो कभी ऑपरेशन समाधान के माध्यम से।

विजेंद्र मीणा ने लोगों से अपील की कि बिरसा मुंडा की लड़ाई जंगल से निकालकर शहरों तक लाने की जरूरत है।

रणधीर सिंह ने कहा कि सुप्रीम कोर्ट की इस आदेश पर कार्यवाही हुई तो पूरी मानवता खतरे में आ जायेगी। पूरा पर्यावरण बर्बाद कर दिया जायेगा। आने वाले समय में हवा भी खरीदनी पड़ेगी।

वरिष्ठ शोध छात्र प्रवीण नाथ यादव ने कहा कि जयपाल मुंडा के कड़े संघर्षों के कारण आदिवासियों के हक और अधिकारों,जल, जंगल, जमीन और पहाड़ों, उनकी बोल-चाल, रहन-सहन, गीत-गवनई और संस्कृति के रक्षा के लिए पाँचवी और छठवीं अनुसूचियाँ बनाई गई।लेकिन देश में पिछले 70 वर्ष से कांग्रेस की तीन रंगिया झण्डा और भाजपा के भगवा झंडा तले होने वाली ‘जनेऊ लीला’ के कारण ये दोनों अनुसूचियाँ जमीन पर नहीं उतर पायी है। इसलिए आज जयपाल सिंह मुंडा के संघर्षों को मुँह बिराते हुए आदिवासियों से उनका जल,जंगल और जमीन छीना जा रहा है।

इस अघोषित आपातकाल के दौर में लोहिया जी की इस सीख,”जिस दिन इस देश की सड़कें सुनी हो जायेगी, उस दिन इस देश की संसद आवारा हो जायेगी” से प्रेरणा लेते हुए हम सभी किसानों, आदिवासियों और छात्रों-नौजवानों को सड़क पर उतर कर जनेऊ लीला के खिलाफ निर्णायक संघर्ष का बिगुल फूँक देना चाहिए।

बीएचयू के पूर्व छात्र नेता और बनारस की सड़कों एवं गलियों के बड़े लड़ाका अफलातून देसाई ने कहा कि हजारों साल से जंगलों में रहने वाले आदिवासी जल, जंगल और जमीन के कुदरती मालिक हैं। संविधान की पाँचवी और छठवीं अनुसूचियाँ इसीलिए बनाई गई है।इसलिए आदिवासियों से उनकी जल,जंगल और जमीन को छीनकर उन्हें बेदखल करना देश और संविधान के खिलाफ है।

सभा को सम्बोधन करने वालों में मोहित, सुकृती, कृतिका, निकिता, आकांक्षा, रविन्द्र भारती, संजीत और चिंतामणि सेठ शामिल रहे है। वही इस कार्यक्रम का संचालन अनुपम ने किया। छात्र-छात्राओं ने हूल जोहार।जमीन हमारी आपकी, नहीं किसी के बाप की! जो जमीन को जोते-बोए, वो जमीन का मालिक हुए। पथलगड़ी आंदोलन जिंदाबाद। जैसे कई नारे लगाये।

इस अवसर पर सभा में चन्द्रनाथ निषाद, मारुति, जयलाल, अनामिका, निशि, पप्पू, आशीष, रणजीत भारती, सुभाँगी, सौम्या, सविता, श्वेता, नीलेश, सपना, मंजू, समीर, अनुज, समन, पुनीत, पूनम, रोहन, सुधीर, सुजीत, रोहित, राजेश, सुनील सहित सैकड़ों की संख्या में छात्र और सामाजिक न्याय पसंद लोगों ने सहभागिता किया। वही छात्रों ने अपील किया कि जब तक यह तानाशाही फैसला वापस नहीं लिया जायेगा, तब तक यह आंदोलन जारी रहेगा।

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