वाराणसी : हिंदी के विकास में लोक नाटक अहम

वाराणसी : काशी हिंदू विश्वविद्यालय(बीएचयू) स्थित महिला महाविद्यालय में  ‘आधुनिक हिंदी साहित्य’ पर छः दिवसीय हिंदी कार्यशाला के तृतीय दिवस हिंदी विभाग की प्रो. आभा गुप्ता ठाकुर का एकल व्याख्यान ‘नाटक और रंगमंच’ पर हुआ। इस कार्यक्रम में बोलते हुए उन्होंने कहा कि हिंदी नाटक और रंगमंच  के विकास को अलग अलग ढंग से देखना ही साहित्य के इतिहास की बड़ी गलती है। जबकि नाटक को जिंदा रखने का कार्य हाशिए के लोगों ने बड़े ही सशक्त ढंग से प्रस्तुत किया है, यही कारण है लोक नाटकों ने हिंदी नाटकों के विकास में अपनी महत्वपूर्ण भूमिका प्रस्तुत करता है। नाटक को समझने के लिए जरूरी है कि आप को पाठ की बेहतर जानकारी हो अन्यथा आप नाटकों के भाव के आत्मसात नहीं कर सकते।

आए हुए अतिथियों का स्वागत करते हुए डॉ. वंशीधर उपाध्याय ने कहा कि वर्तमान समय में नाटकों का सिमटना एक चिंता का विषय है और सवाल उठाया कि जिस आधुनिक हिंदी साहित्य के विकास में  नाटकों का इतना महत्पूर्ण योगदान है वह आज सिमटा हुआ है। हिंदी नाटक और रंगमंच की विभिन्न शैलियों पर बात रखते हुए बताया कि सामूहिकता का ह्रास और स्वार्थ परखता ने हिंदी नाटक जीको कमजोर बनाया। उन्होंने जोर दे कर कहा कि मोहन राकेश और हबीब तनवीर ने हिंदी नाटक को एक नई दिशा और भाषा प्रदान की।

हिंदी नाटक पर अपनी बात रखते हुए प्रो. सुमन जैन ने कहा कि मंचन और नाटक का संयोजन जितना संतुलित और समन्वय के साथ होगा हिंदी नाटक और रंगमंच का विकास उतना ही अधिक होगा। प्रसाद के नाटकों पर बात करते हुए कहा कि केवल यथार्थवादी दृष्टि से देखने पर प्रसाद के नाटक कम समझ में आएंगे। वर्तमान समय में नाटकों की जरूरत और सार्थक पर भी उन्होंने जोर दिया। इस कार्यक्रम का सफल संचालन शीला भारती ने तथा धन्यवाद ज्ञापन हिंदी अनुभाग के प्राध्यापक डा. सौरभ सिंह विक्रम ने किया। उक्त अवसर पर भारी संख्या में शिक्षकों और छात्र-छात्राओं की उपस्थिति रही।

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