बनारस से मिलकर पारस हो जाऊंगा, हां.. मैं फिर जिंदा हो जाऊंगा

शनि मिश्रा की कलम से…🖊️🖊️🖊️🖊️🖊️

बनारस पारस नहीं, छलिया है…
मोह में बांध लेता है उसने मुझको,
बड़े शहर की चमक रास नहीं आती,
घड़ी की सुइयां उलटी घूम रही हैं,
हर रोज बनारस बुला रहा है….
मानों शंकर का डमरू नाद कर रहा है,
अस्सी घाट आवाज दे रहा है,
मंदिर की घंटियां सुनाई दे रही हैं,
गंगा की लहरें, नाव वाले सब कह रहे हैं चले आओ
गालियां कह रही हैं- अब लौट भी आओ मित्र,
मैं कह रहा हूं- अभी इंतजार करो….

लौटेगा मुसाफिर किसी रोज फिर से,
गंगा घाट पर डमरू बजाने को
उन गलियों में लंबी दौड़ लगाने को
चाय की चुस्की और मीठा पान चबाने को
रामनगर की लस्सी और काशी की चाट खाने को
अल्हड़पन और बेखौफ जिंदगी में रम जाने को,
तुलसी के भजन और कबीर वाणी सुनाने को,
शाम ढलते ही अस्सी घाट बन जाने को
मणिकर्णिका में जलकर भस्म हो जाने को,
काशी विश्वनाथ में विलीन हो जाने को

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